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October 9, 2026
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चित्रकूट में 'गीले सूखे' का कहर: विकास के नाम पर 'नदी' की हत्या का नतीजा !
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंडविधानसभा चुनाव 2027

चित्रकूट में ‘गीले सूखे’ का कहर: विकास के नाम पर ‘नदी’ की हत्या का नतीजा !

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

चित्रकूट। कभी “अकाल” से “जलता” चित्रकूट अब “बाढ़ से जल” रहा है। चित्रकूट में इस बार “मानसून ने अपना 100 साल पुराना चरित्र बदल” दिया। आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक 29 अगस्त से 25 सितंबर तक सामान्य से 76% अधिक बारिश हुई। यह बारिश “तीन महीने में धीरे-धीरे नहीं,  बल्कि कुछ ही दिनों में एक साथ फट” पड़ी। वैज्ञानिक इसे ‘वेट ड्राउट’ यानी “गीला सूखा” कह रहे हैं, जहां किसान को न बुवाई का मौका मिलता है, न कटाई का। इसका “सबसे बड़ा शिकार बने किसान”। जून में “सूखे से जूझ रहे रामचरण जैसे किसानों ने गहने गिरवी रखकर डीजल पंप से अरहर बोई, तो सितंबर में वही फसल पानी में सड़” गई।चित्रकूट में 'गीले सूखे' का कहर: विकास के नाम पर 'नदी' की हत्या का नतीजा !जिले में करीब 80% खरीफ की फसल बर्बाद हो चुकी है। यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, कर्ज के जाल में फंसे किसान के भविष्य का संकट है। दूसरा बड़ा संकट “अर्थव्यवस्था” पर है। रामघाट का पूरा इलाका “मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी” का “प्राकृतिक फ्लडप्लेन” है। वैज्ञानिक रूप से यह “नदी का रास्ता है, लेकिन नीतिगत भूल के चलते इसी पर होटल, दुकानें और पक्के घाट बना” दिए गए। नतीजा, 29 अगस्त से 25 सितंबर तक रामघाट लगातार “एक महीने तक डूबा” रहा। नावें बंधी रहीं, आरती बंद रही और नाविक-पुरोहितों के “घरों के चूल्हे” ठंडे पड़ गए। “धर्मनगरी की आस्था आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप” हो गई।चित्रकूट रामघाट में 'सरयू नदी' का बेरहमी से कत्ल ! आश्चर्य जनक खुलासा !तीसरा और “सबसे गंभीर बिंदु” जल-विरासत की “अनदेखी” है। चंदेलकालीन तालाब जो कभी “हर बूंद” बचाते थे, आज “अतिक्रमण और गाद से पट” चुके हैं। वॉटर हार्वेस्टिंग की “परंपरा खत्म” हो गई है। सरकारी योजनाएं वाटरशेड से लेकर जलशक्ति अभियान तक सिर्फ “कागजों” में हैं, धरातल पर सिर्फ राहत बांटने की “औपचारिकता” है। तार्किक विश्लेषण साफ है कि “यह आपदा प्राकृतिक नहीं, मानव निर्मित” है। जलवायु बदल चुकी है, लेकिन नीतियां नहीं बदलीं। जब तक नदी का “फ्लडप्लेन” खाली नहीं होगा, तालाबों को “पुनर्जीवित” नहीं किया जाएगा और क्लाइमेट रेजिलिएंट खेती को “नीति” नहीं बनाया जाएगा, तब तक “बुंदेलखंड हर साल इसी तरह कभी अकाल से तो कभी बाढ़ से जलता” रहेगा।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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