
- विनोद मिश्रा
बांदा। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने “पीडीए” को लेकर हो रहे “विरोध” पर “करारा और तार्किक जवाब” दिया है। उन्होंने कहा कि “पीडीए” कोई चुनावी नारा या जातीय समीकरण नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की “वैचारिक और संवैधानिक लड़ाई” है। जिसे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव “मजबूती से आगे बढ़ा” रहे हैं। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा कि “पीडीए” का अर्थ है “पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक”। इसके साथ ही इसमें “अगड़ों में वंचित समाज और आधी आबादी के रूप में महिलाएं” भी शामिल हैं।
यह देश और प्रदेश की लगभग “नब्बे प्रतिशत आबादी” है जो “आजादी” के इतने वर्षों बाद भी “सत्ता, संसाधन और सम्मान” में “अपनी वास्तविक भागीदारी से वंचित” रही है। “पीडीए की लड़ाई संविधान” में दिए गए “बराबरी, सम्मान और हिस्सेदारी” के अधिकार को “जमीन पर लागू” कराने की लड़ाई है। नसीमुद्दीन ने कहा कि “पीडीए” का विरोध क्यों हो रहा है, इसका कारण भी “साफ” है। जब तक “पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक” समाज बिखरा हुआ था, तब तक “प्रभुत्व की राजनीति” करने वालों को कोई परेशानी नहीं थी।
लेकिन जब से अखिलेश यादव ने इन “सभी वंचित वर्गों” को “पीडीए” के रूप में “एक मंच पर एकजुट” किया है, तब से विरोधियों के “पेट में दर्द” होने लगा है। सामाजिक न्याय की आवाज जितनी मजबूत होगी, उतनी ही उन लोगों को “तकलीफ” होगी जो “बराबरी की राजनीति को स्वीकार नहीं” करना चाहते। उन्होंने कहा कि “पीडीए का उद्देश्य” किसी व्यक्ति या वर्ग का “विरोध” करना नहीं है, बल्कि “सभी को साथ” लेकर चलना है। इसका मुख्य लक्ष्य सत्ता में “वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित करना, संविधान की रक्षा” करना और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में “पीडीए की सरकार” बनाकर “सामाजिक न्याय की स्थापना” करना है।
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