
- शरद मिश्रा
बांदा। बंटवारा हुए 29 साल हो गए, लेकिन बांदा ने अभी तक चित्रकूट का हिस्सा देना नहीं सीखा। चित्रकूट के 474 शिक्षकों की “खून-पसीने” की कमाई के 32 करोड़ रुपये बांदा ने अपनी तिजोरी में डंप कर रखे हैं। शिक्षक रिटायर हो रहे हैं, “जीपीएफ के लिए चक्कर काट” रहे हैं, और बांदा का “बाबूगिरी वाला सिस्टम कुंडली” मारे बैठा है। 1997 में बांदा से कटकर “चित्रकूट जिला बना।
32 कॉलेज चित्रकूट के खाते में गए, पर उनके शिक्षकों का पैसा बांदा में ही रोक” लिया गया। 29 साल में “एक भी अफसर को यह याद नहीं आया कि यह पैसा किसी और के हक” का है और इसे भेजना है। नतीजा, आज जब “शिक्षक बुढ़ापे में अपने ही पैसे मांगने” जाते हैं तो “फाइलों का रोना रोया” जाता है। हद तो तब हो गई जब मामला शासन तक पहुंचा। प्रयागराज में माध्यमिक शिक्षा के वित्त नियंत्रक को दोनों जिलों के डीआईओएस को तलब करना पड़ा। बृहस्पतिवार को हुई फटकार के बाद जाकर बांदा के डीआईओएस ने हामी भरी है कि पैसा भेज देंगे।
विचारणीय यह है कि क्या फटकार के बिना बांदा को अपने भाई जिले का हक याद नहीं आता ? 32 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं है। यह उन शिक्षकों का पैसा है जिन्होंने अपना जीवन बच्चों को पढ़ाने में लगा दिया। बांदा ने 29 साल तक इस पैसे को दबाए रखकर न सिर्फ लापरवाही दिखाई है, बल्कि शिक्षकों के भरोसे को भी तोड़ा है। चित्रकूट के डीआईओएस रविशंकर ने साफ कहा है कि जब तक पैसा कोषागार में नहीं आता, तब तक बांदा के वादे पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
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