
- विनोद मिश्रा
बांदा। विधानसभा चुनाव में अब “पांच महीने ही बचे” हैं और ऐसे “नाजुक वक्त” पर समाजवादी पार्टी ने उमेश यादव को जिलाध्यक्ष बनाकर “बड़ा दांव” तो खेला है, लेकिन यह “ताजपोशी फूलों की सेज नहीं कांटों का ताज” है।
जिले में सपा संगठन की “हालत” किसी से “छिपी” नहीं है। “पार्टी कई खेमों में बंटी” है। बड़े नेता “एक-दूसरे की टांग खिंचाई” में लगे हैं। “कोई तीर घाट देख रहा है, तो कोई मीर घाट”। आपसी कटुता और वर्चस्व की लड़ाई इस कदर “हावी” है कि एक मंच पर सबको लाना “तराजू पर मेंढक” तौलने जैसा है। यही वजह है कि “जमीन पर कार्यकर्ता भी बिखरा” हुआ है।
आलाकमान ने साफ कर दिया है कि “चुनाव पीडीए के भरोसे ही लड़ा” जाएगा। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को “बूथ स्तर तक जोड़ना” है। लेकिन हकीकत यह है कि बांदा की चारों विधानसभाओं में बबेरू को छोड़ दें तो “सदर बांदा, तिंदवारी औऱ नरैनी में बूथ कमेटियां कागजों” पर हैं। कहीं अध्यक्ष नहीं तो कहीं कार्यकर्ता नहीं। ऐसे में “पीडीए का नारा जमीन पर उतरेगा कैसे ? यह सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा” है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो उमेश यादव के पास समय बहुत कम और चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। उन्हें पहले अपने ही दिग्गजों को साधना होगा, फिर बूथ तक संगठन खड़ा करना होगा। अगर वह “पांच महीने में यह करिश्मा” कर दिखाते हैं तो सपा मुकाबले में आ जाएगी, वरना “कांटों भरा यह ताज चुनाव में पार्टी के लिए भारी पड़” सकता है।
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