
- विनोद मिश्रा
बांदा। राजनीति में कब कौन मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने लगे, कहा नहीं जा सकता। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों “भाजपा खेमे की एक आत्मा” का है, जिसकी स्थिति भटकती आत्मा जैसी हो गई है। यह ‘भटकती आत्मा न घर की है, न घाट की’। कभी ‘बांदा’ विधानसभा तो कभी ‘तिंदवारी’ विधानसभा, ‘टिकट की चाह’ में इसका ‘सियासी भटकाव’ जारी है !
राजनीतिक गलियारों में इस भटकती आत्मा को ‘पर्यटन नेता’ भी कहा जाने लगा है, क्योंकि इसका काम ही पर्यटन करना रह गया है। बताते हैं कि इस “आत्मा का उदय कथा-यज्ञ के मंच” से हुआ। “धर्म के मंच” से इसने “सियासत के मंच” तक की “छलांग लगानें की मंशा” पाली है। पहले भाजपा के एक बड़े राष्ट्रीय नेता के आंगन में इसका निवास था। वहां “लक्ष्मी की कृपा बरसी तो आत्मा ने खुद को बड़ा नेता” मान लिया और सीधे “बांदा में अपना सियासी ठिकाना तलाशने” लगी।
इस भटकती आत्मा की मंशा है कि कैसे भी “विधानसभा टिकट” मिल जाए, चाहे “बांदा से मिले या तिंदवारी” से। लेकिन “पेंच” यह है कि इन “दोनों ही सीटों” पर “भाजपा के कद्दावर, जमीनी और जनप्रिय नेता” पहले से ही “मजबूती से जमे” हैं। उन्हें डिगाना “भटकती आत्मा” के बस की बात नहीं है !
राजनीतिक पंडितों की मानें तो “भटकती आत्मा” को “न बांदा में ठौर है,न तिंदवारी में”। ऊपर से ‘पर्यटन नेता’ का तमगा अलग ! ऐसे में “आत्मा की शांति भंग” है और “भटकाव लगातार जारी” है। फिलहाल बांदा की “सियासत इस भटकती आत्मा के सियासी पर्यटन” की “चर्चा से गुलजार” है। जनता “राजनीतिक चटकारे” ले रही हैl
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