
- विनोद मिश्रा
बांदा। देश को “आजाद हुए 78 साल बीत” गए। इस दौरान लाल किले से न जाने कितनी “घोषणाएं” हुईं, संसद में गांव-गरीब के नाम पर कितने “वादे” हुए, पर बांदा का “एक गांव ऐसा भी था जहां आज तक किसी सांसद की परछाई तक नहीं पड़ी” थी। वह गांव है बोड़ेपुरवा।
पिछले दिनों जब “पहली बार सांसद कृष्णा पटेल इस गांव पहुंचीं तो नजारा देखने लायक” था। बच्चे, जवान और बूढ़े सभी “आश्चर्य से उन्हें देख” रहे थे। कई बुजुर्गों ने तो पास आकर पूछा, आप ही सांसद हैं? उनकी आंखों में हैरानी के साथ-साथ 78 साल के इंतजार का दर्द भी था।
यह इंतजार खत्म हुआ है विद्या धाम समिति के सचिव राजा भइया की वजह से। न सरकारी बजट, न बड़ा फंड। ग्रामीणों ने खुद पसीना बहाकर, श्रमदान कर अपने बच्चों के लिए एक “शिक्षा सेंटर” बना डाला। इस “जज्बे ने ही सांसद को गांव तक खींच” लाया। शायद “तहसीलदार तक न पहुंचने वाले इस गांव में जब सांसद पहुंचीं तो महिलाओं ने मांगलिक गीत गाए, किशोरियों ने कलश सजाकर स्वागत” किया।
इस मौके पर “बच्चों को निःशुल्क ड्रेस, किताबें और पेंसिल बांटी गईं और पूरे गांव ने संकल्प” लिया कि अब “एक भी बच्चा अनपढ़ नहीं” रहेगा। ग्रामीणों के “प्यार से गदगद सांसद ने गांव को टीन शेड वाला शिक्षण कक्ष, दो स्ट्रीट लाइट और पक्का संपर्क मार्ग देने का ऐलान” किया है। “बोड़ेपुरवा अब सिर्फ एक गांव नहीं रहा, वह बन गया है उस सोच का नाम कि अगर गांव खुद ठान ले तो किस्मत को भी झुकना” पड़ता है।
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