
- विनोद मिश्रा
बांदा। जिले की सबसे बड़ी पंचायत के अध्यक्ष सुनील पटेल का “कथित भ्रष्टाचार” पूरे प्रदेश का “सिरमौर्य” सा बन चुका है ? “कमीशन खोरी का तांडव” देख “पंचायत सदस्यों में चिंतामय हाहाकार” है। अपने बड़े भाई जो “संघ के बड़े नेता” है, उनकी “कथित सरपरस्ती” ने जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल में “अहंकार का ऐसा बीज” बो दिया है जो, “भाजपा की जन कल्याणकारी लोकतांत्रिक नीतियों” का “मखौल” उड़ा रही है ?

सूत्रों की खबरों पर यदि “विश्वास” माने तो, जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील का बड़ा भाई जो “बुंदेलखंड में संघ राजनीति” में चित्रकूट मंडल में कार्यरत है, उसने भी अपने भाई को “व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने हेतु” कथित रूप से यहां की राजनीति को “कोठागामी” सा कर दिया है ? उसका कुटिल लक्ष्य अपने भाई सुनील को बबेरू विधानसभा का विधायक बनवाना है ! इसके लिए संघ में “टॉप टू बॉटम” के पत्ते फेंट रहा है !

इन्हीं संदर्भों में “बंदर के हाथ में छूरा” आ जाने की “कहावत” सा चरित्तार्थ का “केंद्र बिंदु” बन गया जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल का “अंहकार” शनिवार को “बोर्ड की बैठक” में “कुख़्यात कथित भ्रष्ट रूप” में दिखा !

उसनें लोकतांत्रिक कार्यवाही की “आत्महत्या” की ? तमाम ऐसे “चाटुकार डीडीसी” भी ईमानदारी को “तिलांजलि” देकर “कमीशनखोरी के कथित लालच” में “लोकतांत्रिक नियमावली” की “हत्या” में “सहभागिता” निभाई। इस ख़ुशी में देर रात तक आपस में “चियर्स” करते रहे !

हम जो लिख रहे हैं उसपर अपनी ओर से “वैधानिकता की मुहर” नहीं लगा रहे, लेकिन सूत्रों की “सत्यता के आंकलन” को अगर मानें तो शनिवार को “जिला पंचायत बोर्ड की जो बैठक” हुई उसमे नियामवली अनुसार “जो भी प्रस्ताव सदन में बहुमत से पास होना चाहिए था” वह “वैधानिक रूप” से नहीं हुआ !

लेकिन इस बैठक के सन्दर्भ में जो सोशल मीडिया में “वायरल वीडियो उजागर” हैं कि बिना “कोरम” पूरा हुए कैसे जिला पंचायत अध्यक्ष ने “करोड़ो” की धनराशि को “बतौर कमीशन हड़पने” का प्रयास किया ? यह वर्तमान में “जिला प्रशासन एंव शासन के लिए चुनौती” बन गई है।

सूत्र तो यहां तक बताते है कि जिला पंचायत अध्यक्ष ने कुछ “जेबी मीडियाकर्मियों” को अपना भ्रष्टाचार छुपाने के लिए “सहारा” बनाया है, लेकिन “ऐसे “चापलूस मीडियाकर्मी” जो स्वार्थवश “बे पेंदी का लोटा” है ? वह दोनों पक्षों की ओर से “पत्रकारिता की वास्तविक मर्यादाओं” की अनदेखी कर “आर्थिक लाभ” उठा रहे है ? जिससे उनकी सामाजिक स्थित “थू-थू” जैसी “उत्पन्न” हो गई है ? भले ही “ऐसे स्वार्थी पत्रकार” अपने को “पत्रकारिता जगत” का “सुरमा भोपाली” समझने का “मुगालता” पाले हो, लेकिन उनका यह “मुगालता” स्वतः “पीठ थपथपाने” सा माना जा रहा है !
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