
- शरद मिश्रा
बांदा। करवा चौथ नें “सुहाग का सबसे कठिन इम्तिहान” लिया। सोलह श्रृंगार कर “छतों पर खड़ी” सुहागिनें “चांद का इंतजार” करती रहीं, लेकिन “चांद बदली में छुपा” रहा। सुबह से “शाम सात बजे से नौ बजे तक” आसमान में बादल छाए रहे।
इंतजार लंबा हुआ तो “घबराहट” बढ़ी। बुजुर्ग महिलाएं कहती रहीं “चांद” निकलेगा जरूर। बच्चे मोबाइल में चांद का समय सर्च करते रहे। आखिर “आस्था ने रास्ता” निकाल लिया।
कई घरों में सुहागिनों ने “चलनी में जलता दीपक” रखा और उसी दिए की “लौ को चांद” मानकर पूजा की। कहीं मोबाइल स्क्रीन पर चांद की तस्वीर लगाकर चलनी से पति का चेहरा देखा गया। तो कहीं बिजली के जलते सफेद रोशनी वाले बल्ब को। सुहागिनों का बदली के बीच भी व्रत टूटा नहीं, भावना पूरी हुई।
जैसे ही चाँद निकलने का समय पंचांग के मुताबिक हुआ, छतों पर एक साथ थालियां सज गईं। चलनी से चांद, फिर चांद से पति का चेहरा देखने की परंपरा निभाई गई। पति ने पत्नी को “पानी पिलाकर” व्रत खुलवाया।
उस पल हर जुबां पर एक ही गीत था “गंगा मइया में जब तक पानी रहे, मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे”। यह गीत सिर्फ गीत नहीं, सुहाग की प्रार्थना बन गया। करवा चौथ की इस रात ने फिर साबित किया कि चांद भले बदली में छुप जाए,सुहागिनों का विश्वास कभी नहीं छुपता।
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